गुरुवार, 26 मई 2011

मुस्कुराते रहिये

मुस्कुराते रहिये 

                                           

भय और आत्महीनता की ग्रन्थि को मन से निकालकर जिस सीमा तक मन को खोल सकें उसको खोलें। मन की बात कहें और दूसरों को भी यह अवसर दें कि वे भी मन की बात कह सकें । अपनी प्रसन्न एवं संतुष्टि व आशान्वित मनोवृत्ति का परिचय प्रकट होने दें । इससे मनुष्य का गौरव बढ़ता है । इस बात का परिचय भी मिलता है कि उसके भीतर खोखलापन या खालीपन नहीं है ।


कहते हैं कि जब मनुष्य हंसता है तो मोती उगते और फूल झरते हैं । इस प्रसाद को पाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति लालायित रहता है । हंसते हुवे मनुष्य को देखकर देखने वाले प्रसन्नचित्त हो जाते हैं । ठीक उसी प्रकार कैसे रोते को देखकर रोना आ जाता है । यह बिना पूंजी का उपहार है , जिसे किसी को भी कितनी ही देर तक कितनी ही मात्र में दिया जा सकता है । किसी के दांत प्रकृति ने कैसे ही क्यों न बनाये हों , पर जब वे खिलते हैं तो सहज सौन्दर्य से भर जाते हैं । मुस्कुराने का स्वभाव मानसिक स्वास्थ्य को विद्यमान रखने और दूसरों को वही उपहार बांटने की दृष्टि से बहुत उपयोगी है । इसे विकसित करने के लिए व्यायाम या योगाभ्यास की भांति इसे प्रारम्भ किया जा सकता है ।*****

कल्पना से सुविचार को मजबूत कीजिये

कल्पना से सुविचार को मजबूत कीजिये                                                                                                                                            





एक पुरानी कथा है कि एक व्यक्ति जंगल से गुजर रहा था । भूख-प्यास से बेहाल हो गया । गर्मी और थकान से हारा वह व्यक्ति एक छायादार वृक्ष के नीचे बैठ गया । उसे यह पता नहीं था कि वह जिस वृक्ष के नीचे बैठा है , वह कल्प-वृक्ष है । गर्मी से राहत मिली तो सोचा कि यदि कहीं से खाना मिल जाता । अचानक उसके सामने सुस्वादु भोजन का थाल और जल से भरा मटका उपस्थित हो गया । उसने पेट भर खाना खाया और पानी पीया । अब उसका दिमाग चलने लगा । उसके भीतर डर और आशंकाएं सिर उठाने लगीं । उसने सोचा , हो न हो , इस पेड़ पर कोई भूत रहता होगा , जिसने यह चमत्कार किया । तब तो यह भूत पेड़ से कूदकर मुझे खा जायेगा । उसके इतना सोचने पर भर की देर थी कि पेड़ से एक भूत कूदा और उसे खा गया । निश्चित रूप से यह कथा कपोल-कल्पित है , लेकिन इसमें जीवन का मर्म निहित है ।



 कोई भी नकारात्मक विचार यदि हम मन में बैठा लें , तो वह हमें पूरी तरह नकारात्मक बना देता है । और सच मानिये यह छवि लोगों को अच्छी नहीं लगती । लोग हमसे कटते चले जाते हैं । इसके विपरीत सकारात्मक विचारों से हम अपने अंतस और व्यक्तित्व को तो निखारते ही हैं और लोगों को भी अपने पक्ष में जोड़ लेते हैं और सुख के भागी बन जाते हैं ।


सकारात्मक विचारों के प्रवाह से हम मन को परिष्कृत करते हैं । मन तभी परिष्कृत होगा , जब हम अपनी कल्पना-शक्ति से सकारात्मक विचारों का सृजन करने लगेंगे । 


सकारात्मक कल्पनाओं को संकल्प में बदलकर हम मन को साध लेते हैं । फिर मन कल्पवृक्ष की तरह सदैव अच्छे परिणाम देने लगता है । ओशो के अनुसार _ मन कम्प्यूटर की भांति अतीत के अनुभवों और सीखी गयी जानकारियों का एक यंत्र है , जो जीवन में नई सम्भावनाओं के द्वार खोलता है । ' अत: स्पष्ट है कि जब हमारी कल्पना-शक्ति संकल्प-शक्ति में परिणत हो जाती है तो मन कल्पवृक्ष बन जाता है और इच्छित फल देने लगता है। हमें मात्र अपने भीतर के डर , अहंकार , लोभ इत्यादि की कुप्रवृत्तियों को बस दूर करना होगा ।******





सम्यक -संकल्प

सम्यक - संकल्प 



सम्यक का अर्थ है _ यथोचित , दृढ़ और यथार्थ । संकल्प का अर्थ है _ विचार । लौकिक जीवन समुचित व्यवहार वाला हो तथा पारलौकिक दृष्टि स्वच्छ हो । इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य सम्यक संकल्प वाला हो । सम्यक-संकल्प से मन के विचारों से उत्साहित होकर काम , क्रोध आदि से छूट जाता है तथा निर्वाण के पथ पर अग्रसर होता है ।

सम्यक-संकल्प का दूसरा प्रकार है _ अद्वेष का संकल्प करना ।  हमें किसी भी प्रकार की हानि पहुंचाता है तो उसके प्रति भी दुर्भाव रखना द्वेष-दृष्टि है । । 

यदि व्यक्ति अपने सामर्थ्य का विचार करें और सम्यक अर्थात दृढ़ संकल्प के साथ कार्य में जुट जाये तो उसकी कामना की पूर्ति अवश्य होती है । ******

भाव ने बनाया प्रभु को भाव ने बनाया प्रभु को

भाव ने बनाया प्रभु को   




प्रकृति से प्राण वायु साँस लेने के लिए , स्वस्थ शरीर के लिए अति आवश्यक जल , अन्न , फल-फूल आदि उपलब्द्ध है । मानव के ज्ञान-अर्जन के लिए ज्ञानी पुरुषों की श्रुतियां , परमार्थ जीवन , प्रभु-मिलन का पथ और मार्ग-दर्शन के लिए शास्त्र-ज्ञान उपस्थित है । ये सारी व्यवस्थाएं एक दिन में नहीं बनी होंगी । उन्हें बनाने और कार्य रूप में परिणत करने में किसी का तो योगदान रहा होगा । उसे हम एक क्षण में विस्मृत नहीं कर सकते । उनका नाम हम अगर नहीं भी जानते हैं तो भी उसे किसी दिव्य शक्ति की संज्ञा या प्रभु के नाम से पुकारा जा सकता है । इसे भव-बंधन भी कहा गया है और इसी में सुख-दुःख विद्यमान है । सकाम कर्म ही भव-बंधन का कारण है। जब तक मनुष्य शारीरिक सुख का स्तर बढ़ाने के उद्देश्य से कर्म करता है , तब तक विभिन्न प्रकार के देहांतरण करते हुवे महाबन्धन में फंसा रहता है ।

इस संसार में मनुष्य के आने का उद्देश्य सिर्फ जीवन -यापन ही नहीं है । जीवन-यापन के उपयोग के लिए यहाँ तमाम सुविधाएँ पहले से ही उपलब्द्ध हैं । अत: उनके प्रति प्रेमाभक्ति ही लक्ष्य होना चाहिए । उस से पूर्ण तृप्ति होगी । जो मनुष्य प्रभु-भक्ति में लीन रहता है तो वह अपने में प्रसन्न रहता है । स्वार्थ में तत्पर व्यक्ति कभी प्रभु-भक्ति में मन नहीं लगा सकता है । उसकी यही कमजोरी उसे परमपिता से दूर करती है । वस्तुत: प्रत्येक जीव प्रभु की आज्ञा का पालन करते हुवे धरती पर आया है । प्रभु जन-जन के ह्रदय में परमात्मा-रूप में स्थित हैं। जब मन भौतिकता द्वारा विपथ कर दिया जाता है , तब वह विकारी कार्य-कलापों में उलझ जाता है और पूर्ण प्राप्ति नहीं कर पाता । हमारे अंदर परमात्मा का अंश आत्मा अवस्थित माना गया है । वही परम तत्व है और जो कर्म , अकर्म एवं सुकर्म का वाहक है ।*****

सोमवार, 23 मई 2011

रैन बसेरा

रैन बसेरा



यह दुनिया एक रैन बसेरा है । महत्त्वपूर्ण बसेरा नहीं , अपितु नींद है । नींद नहीं आनी तो नहीं आनी । चाहे स्वर्ण-शैया हो या मोती-माणिक की चादरें और देह करवटें बदलती-बदलती ऊब जाती है । 

परिजन जीवन-यात्रा की रेल में अंग-संग बैठे हुवे सहयात्रियों की तरह अपने होते हुवे भी अपने नहीं होते । क्योंकि उनकी सम्बद्धता कुछ निही स्वार्थों व संचित कर्मों के अनुसार अलग-अलग होती है । उनका गन्तव्य और मन्तव्य भी उसी अनुपात में भिन्न-भिन्न होता है । कोई कहीं उतरता है और कहीं अन्य स्तन पर उतरता है ।


जीवन-यात्रा की खाली रेल में जब सवार हुवे तब भी अकेले चढ़े थे । खाली रेल से जब भी उतरेंगे तब भी अकेले ही उतरेंगे और जीवन रेल को खाली ही छोड़ना होगा । इस आकर्षण जगत में असंख्य पालक -पिता के होने पर भी हर मनुष्य का सत्यमेव पिता एक ही है । यही परमपिता है और वही परमपिता ही उसके लिए चिंतित रहता है । सम्पूर्ण चराचर सृष्टि का एक ही परमपिता है , जो सर्वशक्तिमान ईश्वर है । रैन बसेरे तो उस महायात्रा के क्षणिक विश्राम-स्थल मात्र हैं । पहुंचना तो बसेरों का वह आखिरी पड़ाव है , जहाँ से तृष्णाओं एवं कामनाओं की इस जगत-यात्रा में पुनरावृति न हो । हम उस पिता की चिंता न करें और वह परमपिता हमारी चिंता निश्चित रूप से करेगा ही ।&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&

नमन

नमन


सामान्यतया नमन शब्द का अर्थ नमस्कार करने , झुक जाने , नम जाने , नम्रीभूत हो जाने , किसी का चरण-स्पर्श करने आदि के अर्थ में प्रयोग किया जाता है । 

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ह्रदय की मिट्टी का द्रवीभूत हो जाना ही नमन कहलाता है । साथ ही नमन का अर्थ यह भी हो सकता है कि नमन अर्थात जहाँ मन ही न हो। अत: स्व-अस्तित्व को भूल कर अपने आराध्य के चरणों में में समर्पित हो जाये । हमारा कुछ भी शेष न रहे , हम अपने आराध्य के चरणों में विलीन हो जाएँ । यही नमन का मूल भाव हो सकता है ।

अस्तु , आज तक हमने नमन तो किया , परन्तु नमन का वास्तविक रूप हमारे अन्तस्तल में उद्भूत ही नहीं हुवा । शरीर झुका और मस्तक झुका पर मन नहीं झुक सका । यदि एक बार भी हम ऐसा नमन कर लें तो इस संसार के सारे कष्ट ही दूर हो जायेंगे । अपने शास्त्रों एवं गुरुजनों से सच्चा प्रेम हो जायेगा और प्रेम हो जाने पर समर्पण हो जायेगा । परन्तु यह तभी होगा कि जब हम नमन की मात्र औपचारिकता ही पूर्ण न करें किन्तु यथार्थता का अवलम्बन लें । एक बार ऐसा नमन हो कि हमारे अन्तरंग से अवगुणों का गमन और कल्मषों का शमन हो जाये।********

रविवार, 22 मई 2011

जीवन को आत्म-कल्याण


जीवन को आत्म-कल्याण


अरे भई , यह शरीर भी एक जेल है ओर इसमें यह आत्मा युग-युगों से कैद है ।  एनी जेल में पहुंचा दिया जाता है । वहां कुछ समय रहकर वह अपने कुकर्मों की सजा भोगता एवं मार खाता है । वह पुलिस वालों के डंडे ही क्या अपितु हंटरों के प्रहार सहन करता है और रोता -पीटता सर धुनते हुवे अपना समय पूर्ण करता है ।
इस शरीर रूपी जेल में कैद आत्मा भी कर्मों की सहन करता है और कभी नरक -गति में जा कर वहां के हंटरों की वेदना सहन करता है । कभी दैवगति की वासना में उलझ जाता है और कभी मनुष्य -गति के अहंकार रूपी घनों के प्रहार सहता है । अनंत गुण-वैभव से संयुक्त जीव हम क्यों निज प्रभुता को भूल कर व्यर्थ ही कष्ट सहन कर रहे हैं । यदि हम इस जेल से मुक्त होना चाहते हैं तो हमें अपराधिक प्रवृत्तियों से दूर रहना चाहिए । अशुभ पाप पूर्ण प्रवृत्तियों से मुख मोड़ कर शुभ एवं पुण्य युक्त क्रियाओं को प्रारम्भ करना चाहिए तथा अपने जीवन को आत्म-कल्याण और सर्व-कल्याण में प्रवृत्त करना चाहिए ।*******