रविवार, 15 सितंबर 2013

जीवन का हर कर्म आनन्द के साथ

जीवन का हर कर्म आनन्द के साथ  


जीवन का आधार प्राण है और वहां गति है . जहाँ गति है ,वहां लय , गीत एवं संगीत है . जीवन एक उत्सव के रूप में धारण करना चाहिए .  कला आनन्द का स्रोत है और आनन्द पूर्ण जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए . जीवन का हर कर्म आनन्द के लिए नहीं , अपितु आनन्द के साथ होना चाहिए . प्रभु सच्चिदानन्द रूप है . स्वयं हम सत , चित एवं आनन्द रूप ही हैं . यही प्रभु का संयोग एवं योग है . सच्चिदानन्द का सच्चिदानन्द से मिलन ही अद्भुत योग है .

भारतीय चिन्तन एवं दर्शन वैदिक पृष्ठभूमि पर आधारित है . ईश्वर . जीव एवं प्रकृति के सम्बन्धों का चिंतन- मनन कर आनन्द के अनंत सागर तक हमें पहुंचाता है . जीवन में कभी भी निराशा का क्षण नहीं आने देता . वह कर्म करने की सतत प्रेरणा से ओतप्रोत है . कर्म भी वह जो फल की आसक्ति से रहित हो . निष्काम कर्म की भावना से पूर्ण कर्म होना चाहिए . प्रकृति हमारा आदर्श और हमारी प्रेरणा है . नदियाँ जिस प्रकार अपना जल स्वयं नहीं पीतीं तथा वृक्ष अपने फलों को स्वयं नहीं खाते हैं . बदल अपने हित के लिए नहीं बरसते हैं . इसी प्रकार सज्जन व्यक्तियों का जीवन परोपकार के लिए ही होता है __

                            " पिबन्ति नद्य: स्वयमेव नोदकं , स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षा: .
                             धराधरो वर्षति नात्महेतवे , परोपकाराय सतां विभूतय : "


प्रकृति के कण-कण में आनंद का वास होता है . उगते सूर्य की किरणें , पक्षियों का कलरव , रंग-बिरंगे फूलों पर ओस की बूँदें जैसे सामान्य दृश्य भी किसके ह्रदय को आल्हादित नहीं करते . हमारे आनन्द का स्रोत ह्रदय है . हमारे मन में जीवन , जगत एवं समाज के प्रति जैसा दृष्टि कोण है , वैसा ही हमारे चरों ओर प्रतिक्रिया संसार में प्रकट होता है . हम जितना सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएंगे उतना ही सांसारिक समस्याओं का समाधान हमें आसानी से मिल जायेगा .

हमारा मन स्वभाव से चंचल है . वह समय और स्थान की परिधि में बंधना नहीं चाहता है . हम वर्तमान में नहीं रहना चाहते हैं . भूत का संशय एवं भविष्य की अनिश्चितता हमें उद्वेलित करती रहती है . वास्तव में वर्तमान क्षण _ ' तत्क्षण ' ही महत्त्वपूर्ण है , अपितु ' न भूतो न भविष्यति ' पूर्णत: महत्त्वहीन है . ओशो के शब्दों में _  ' भूत और भविष्य को भूल जाओ और वर्त्मन में जीओ . आज सदा कर्म है और फल सदा कल . फल तो कल्पना में है . फल का अस्तित्व नहीं है , अस्तित्व तो कर्म का है . ' 

जीवन-चेतना का एक प्रवाह है _ वर्तमान से भविष्य की ओर . जीवन एक आरोहण है , आत्मा से परमात्मा की ओर . जीवन एक महा यात्रा है , मृत्यु से अमरता की ओर . जीवन एक प्रयोगशाला है , अपने आपको जानने , समझने और विश्लेषण करने की . बुद्ध ने अपने अंतिम क्षणों में अपने शिष्यों को उपदेश दिया _ ' अप्प दीपो भव ' अर्थात अपने दीपक स्वयं बनो . अपनी शक्तियों को पहचानो और उन्हें उजागर करो . मन की शक्ति अतुल अपार है . यदि मन हमारे वश में हो जाये तो जीवन की महानतम उपलब्द्धियों को प्राप्त किया जा सकता है .

हमे शास्त्रों में कहा गया है कि मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है . मोक्ष का अर्थ है मुक्ति . मुक्ति_ अज्ञानता  से , इच्छाओं से , मोह एवं अंधकार से . इसे प्राप्त करने के लिए मन को वश में करना आवश्यक है  
है . मन को वश में करने के लिए बुद्धि का अंकुश आवश्यक है . यदि मन में उत्कर्ष की भावना है तो हम अपनी स्वाभाविक प्रतिभाओं को विकसित करने में समर्थ हैं . साहित्य,संगीत , कला की विधाओं में जीवन के विभिन्न भाव-हर्ष , उल्लास , प्रेम , सौहार्द , करुणा , दया आदि बिखरे होते हैं , जो आनन्द के स्रोत हैं . सुख तो भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति से भी मिल सकता है , जो नाशवान हैं . सुख निर्मित है , परन्तु आनन्द असीम एवं अनंत है और यह निरंतर बढ़ता रहता है . आनन्द उसी सर्वोच्च , सर्वव्यापक , सर्वशक्तिमान के साथ स्थायी सम्बन्ध रखने में है . ओस्कर वाइल्ड के अनुसार _  ' It does not matter how long but how you live . '


इतिहास साक्षी है _  आदि गुरु शंकराचार्य केवल 32 वर्ष में के लघु जीवन में देश के चारों चार धाम की स्थापना कर जगद्गुरु की उपाधि से सम्मानित हुवे . शंकर का वेदांत भारतीय चिन्तन धारा का परम उत्कर्ष है . स्वामी विवेकानन्द ने केवल 39 वर्षों के लघु जीवन में नव्य- वेदांत की स्थापना कर मानव-सेवा को सबसे बड़े धर्म के रूप में प्रस्तुत किया .

अस्तु , जीवन एक उत्सव है और जो इसे उत्सव के रूप में देखता है , वह वास्तव में जीवन की गति एवं प्राण को प्राप्त कर लेता है .^^^^^^^^^^^^^^^^








शनिवार, 14 सितंबर 2013

मन शांत नहीं तो कहीं शांति नहीं

मन शांत नहीं तो कहीं शांति नहीं  


प्रभु कृपा से हम इतना समझते हैं और स्वीकारते हैं तथा मानते हैं कि हमें शांति चाहिए ; अशांति को किसी भी रूप में हम नहीं चाहते हैं . हमें संसार में भी शांति चाहिए और मन में भी शांति चाहिए . शांति में हम अनुकूलता तथा अशांति में हम प्रतिकूलता का अनुभव करते हैं . अनुकूलता होने पर हमें सुख होता है एवं प्रतिकूलता होने पर दुःख होता है . बाहर की अशांति हमारे मन में भी अशांति पैदा करती है पर परिणामत:  हम दुखी हो जाते हैं . 


बाहर की अशांति के कारण मन में अशांति उत्पन्न होती है . अत:हम बाहर की अशांति को ठीक करने का यथासम्भव  प्रयास करते हैं . बाहर की अशांति को हम कुछ कम भी कर पाते हैं . परिणामत: अंदर स्थित मन की अशांति भी कुछ कम हो जाती है . इस प्रकार के प्रयत्न व अनुभव से हमें निश्चित हो जाता है कि बाहर की अशांति के कारण हमारे अंदर की अशांति उत्पन्न होती है और बाहर की अशांति भी कम या समाप्त होने पर अंदर की अशांति भी कम या शांत हो जाती है . इस प्रकार हम बाहर की अशांति - शांति और अंदर की अशांति - शांति में कारण- कार्य सम्बन्ध समझ लेते हैं . परिणामत: इसी पर केन्द्रित होकर अशांति हटाने व शांति पाने के प्रयास में लगे रहते हैं और ऐसा प्रयास सहज एवं स्वाभाविक भी है .
इस निश्चय व यत्न से हमें सफलता मिलती रहती है , किन्तु यह सफलता सीमित मात्र में मिलती  है . हमारी अशांति का कारण मात्र बाह्य अशांति ही नहीं होती . हम अपनी असमर्थता , अकुशलता , अल्पज्ञता , आलस्य , उपेक्षा आदि के कारण भी अशांत और दुखी होते रहते हैं . इनसे होने वाली अशांति कम नहीं होती , बहुत अधिक होती है . हम इनके कारण न केवल बाह्य अशांति के बिना भी अशांत होते रहते हैं , बल्कि बाह्य अशांति से होने वाली अशांति को कई गुना बढ़ा भी लेते हैं . हम बार-बार उन्हीं बाह्य विषयों को विचरते रहते हैं और बार-बार अशांत होते रहते हैं .

बाह्य अशांति को हम अपने प्रयास से कुछ दूर कर पाते हैं , पर पूरी तरह से नहीं . बाह्य अशांति को हम पूरी तरह समाप्त कर भी नहीं कर सकते . बाह्य अशांति का कारण अन्य व्यक्ति भी होते हैं , जिन पर हम पूर्ण नियंत्रण - नियमन भी नहीं कर सकते . लोग पुन:-पुन: अशांति का कारण बनते ही रहेंगे , किन्तु आंतरिक अशांति को हम पूरी तरह समाप्त कर सकते हैं , क्योंकि इसका मुख्य कारण हम स्वयं हैं . यदि हम चाहें तो आंतरिक अशांति को पूर्णत: हटा सकते हैं , इसमें कोई हस्तक्षेप भी नहीं कर सकता .

हम अपने मन के ऊपरी तल पर जीते रहते हैं . मन का ऊपरी तल विभिन्न बाह्य घटनाओं व आंतरिक वृत्तियों से चलायमान - दोलायमान बना रहता है . इसी चंचलता में जीते हुवे हम इनसे सतत प्रभावित होते रहते हैं . मन के इस ऊपरी तल पर सामान्यत: हम अल्प नियंत्रण ही कर पाते हैं . प्रभु-कृपा से यदि हम मन के अंदर गहराई में प्रविष्ट हो जाएँ तो गहन शांति को तत्क्षण उपलब्द्ध हो सकते हैं .

समुद्र ऊपरी तल पर सदा चंचल - दोलायमान बना रहता है , अत: अशांत भी बना रहता है . उसमें बड़े तूफान भी आते हैं , तब अत्यंत अशांत हो जाता है . इसी प्रकार मन का ऊपरी भाग भी थोड़ा या अधिक चलायमान बना रहता है . यदि हम उसमें तैरने - ठहरने में समर्थ नहीं होते हैं , तो अशांत भी होते रहते हैं . जैसे समुद्र की गहराई में में उतर जाने पर चंचलता - अशांति नहीं रहती , उसी प्रकार यदि हम मन की गहराई में उतर जाएँ तो चंचलता - अशांति से उबर कर स्थिरता - शांति - सुख उपलब्द्ध हो सकते हैं .

एकांत में बैठकर जैसे ही मन में गहरे से गहरे उतर जाते हैं , वैसे ही चंचलता - अशांति - दुःख से दूर हटते जाते हैं और स्थिरता - शांति - सुख से युक्त होते जाते हैं . प्रभु ने हमें ऐसा मन दिया है जो लोक व्यवहार हेतु चलायमान भी हो सकता है व आंतरिक व्यवहार हेतु पूर्ण स्थित और एकाग्र भी हो सकता है . यह हमारी अकुशलता है की हम लोक व्यवहार में उपयोगी मन को चलायमान कर अव्यवस्थित - अनियमित करके लोक-व्यवहार में बाध्यें उत्पन्न कर लेते हैं व दुखी होते रहते हैं . यह हमारी अज्ञानता है की हम मन के स्थिर - एकाग्र हो सकने के सामर्थ्य का उचित व पर्याप्त उपयोग नहीं कर पाते हैं . प्रभु ने हम पर कृपा कर रखी है , हमें उस कृपा का लाभ उठाना है .******************


बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से खाय

बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से खाय 


वैदिक धर्म का कर्म- फल सिद्धांत पूर्णरूपेण स्पष्ट है . प्रत्येक जीव को अपने द्वारा किए गए सभी शुभ - अशुभ कर्मों का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है . ' सत्यार्थ प्रकाश ' के सप्तम समुल्लास में इस विषय पर चर्चा करते हुवे महर्षि दयानन्द ने लिखा है _

" प्रश्न _  परमेश्वर की स्तुति प्रार्थना और उपासना करनी चाहिए या नहीं ?
उत्तर _  करनी चाहिए .
प्रश्न _ क्या स्तुति आदि करने से ईश्वर अपना नियम छोड़ , स्तुति - प्रार्थना करने वाले का पाप छुड़ा देगा ?
उत्तर _ नहीं .
प्रश्न _ तो फिर स्तुति - प्रार्थना क्यों करना ?
उत्तर _ उनके करने का फल अन्य ही है .
प्रश्न _ क्या है ?
उत्तर _ स्तुति से ईश्वर में प्रीति , उसके गुण - कर्म - स्वभाव से अपने गुण - कर्म -स्वभाव का सुधारना , प्रार्थना से निरभिमानता , उत्साह और सहाय का मिलना , उपासना से परब्रह्म का मिलना और उसका साक्षात्कार होना . "

अपने अन्य ग्रन्थ ' संस्कार-विधि ' के गृहस्थाश्रम - प्रकरण में कर्म-फल सिद्धांत को स्पष्ट करते हुवे महर्षि दयानन्द ' मनुस्मृति ' को प्रस्तुत करते हुवे कहते हैं _ ' मनुष्य निश्चय करके जाने कि इस संसार में जैसे गाय की सेवा का फल आदि शीघ्र नहीं होता है . वैसे ही कए गये अधर्म का फल भी शीघ्र नहीं होता , किन्तु धीरे - धीरे अधर्म कर्त्ता के सुखों को रोकता हुवा सुख के मूलों को काट देता है , पश्चात अधर्मी दुःख ही दुःख भोगता है .
यदि अधर्म का फल कर्त्ता की विद्यमानता में न हो तो , पुत्रों और पौत्रों के समय में न हो तो ; पर फिर भी नातियो के समय में अवश्य प्राप्त होता है . किन्तु यह कभी नहीं हो सकता कि कर्त्ता का किया हुवा कर्म निष्फल होवे . '

ऋषिवर के कहने का तात्पर्य स्पष्ट है कि कर्मों का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है . दुष्कर्मों के फल से बचने या उनके क्षमा होने का का कहीं उल्लेख या संकेत नहीं है . महर्षि द्वारा प्रतिपादित कर्म - फल व्यवस्था वेद पर आधारित है .

हम जो भी कर्म करते हैं , उनका फल हमें अवश्य ही मिलेगा . इसमें कोई कमी नहीं होगी . क्योंकि ईश्वरीय व्यवस्था में कोई दोष नहीं है . कोई भी हमें कर्म-फल भोगने से नहीं बचा सकता . वहां किसी कि भी सिफारिश नहीं चलती . न ही किसी  दोस्त , मित्र , बन्धु और सम्बन्धी के की कमाई के सहारे हम कोई पुण्य- फल प्राप्त कर सकते हैं . हमारे कर्मों से भरा पात्र वैसे ही सुरक्षित  रहता है , जैसे जो कोई कुछ पकाता है , वही खाता है , अर्थात जो भले-बुरे कर्म मनुष्य करता है , वही उसके आगे आते हैं .

जैसे बछड़ा सहस्रों गायों में भी अपनी माता को पहचान कर उसी के पास जाता है , उसी प्रकार मनुष्य जो भी कर्म करता है , वह भी उसका पीछा करता है . अर्थात मनुष्य को अपने किए कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है . एक नीतिकार ने इस सम्बन्ध में कहा है _ 
                    ' अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभं .
                    न क्षीयन्ते अस्य कर्माणि  कल्पकोटि शतै: अपि .. '
अपने द्वारा किये गये शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के कर्मों का फल व्यक्ति को अवश्य भोगना पड़ता है . बिना भोगे हुवे तो किसी कर्म का फल शत कोटि वर्षों में भी क्षीण नहीं होता . अर्थात फल भोगे बिना पीछा नहीं छूटता .

बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से खाय बात बिलकुल ही सार्थक है . महाकवि तुलसीदास ने स्पष्ट रूप से कहा है _ ' कर्मप्रधान विश्व रचि राखा . जो जस करहि , सो तस फल चाखा .. ' मनुष्य परमात्मा की न्याय-व्यवस्था के अधीन है . कोई व्यक्ति ऐसा दृष्टिगोचर नहीं होता जो यह सोचता हो कि मुझे मेरे सत्कर्मों का फल न भी मिले तो कोई बात नहीं . इसके विपरीत वह आश्वस्त है कि सुकर्मों का फल तो अवश्य ही मिलेगा ही . परन्तु एक विचित्र बात है कि बहुत से स्वाध्यायशील व्यक्ति भी अपने हीन कर्मों से बचने के लिए इसका समाधान शास्त्रों एवं ऋषि- मुनियों के वचनों में खोजते हैं .

पापों के क्षमा होने वाली बात वैदिक सिद्धांतों के प्रतिकूल है . सामान्यत: मनुष्य पुण्य कर्मों का फल प्राप्त करने की इच्छा करते हैं . परन्तु पुण्य कर्म करने की इच्छा नहीं करते . दूसरी ओर वे पाप कर्म का फल उन्हें न मिले ऐसा वे चाहते हैं , पर पाप- कर्म यत्नपूर्वक करते हैं _
                            ' यथा फलं इच्छन्ति पुण्यं नेच्छन्ति मानवा: .
                             न पापफलं इच्छन्ति पापं कुर्वन्ति यत्नत: .. '


हमें अपने जीवन में व्यवस्थित कर्म-फल को समझना चाहिए . तभी ' स्वस्ति पंथानुचरेम ' , अग्नेनय सुपथा ' और ' विश्वानि दुरितानि परासुव ' आदि वेद - वचनों की सार्थकता रह सकती है . वास्तव में सत्य को स्वीकार करने के लिए भी आत्मिक बल की , आत्म- विश्वास एवं प्रभु की न्याय - व्यवस्था में आस्था की आवश्यकता होती है . प्रभु की कर्म - फल व्यवस्था अटल है . बिना फल भोगे हुवे शुभ - अशुभ कर्मों का क्षय नहीं होता और यही वेद का सिद्धांत है .&&&&&&&


नये मानव का भारत में जन्म

नये मानव का भारत में जन्म 



संस्कृति वह तत्त्व है , जिससे व्यक्ति , समाज और राष्ट्र को अपने अस्तित्व को सुरक्षित , संरक्षित एवं विकसित करने क नया आधार मिलता है . संस्कृति वह मूल्य है , जो हम सबको आपस में एकदूसरे से सहयोग , सहकार एवं संवेदनशील सम्बन्धों की डोरी से बांधे रखती है . अपनी संस्कृति मूल्य परक है , जो हमें मानवता की भाषा सिखाती  है तथा मानव को विकसित कर उसके अंदर ऋषि - बोध देती है . वह आध्यत्मिक मूल्यों का पाठ पढ़ाती है , जिससे मानव परमात्मा के संग संग साहचर्य से तादात्म्य स्थापित  कर जीवन में सत्य एवं सौन्दर्य अभिव्यक्त कर सके , परन्तु विडम्बना है कि वर्तमान में इस नव उदारवादी भूमंडलीकरण से जो बाजार मूल्य पैदा हुवा है , उससे मानव सौदे की वस्तु बन गया है .

भारतीय का केंद्र वह मानव है , जिसके अंदर ईश्वरीय अंश विद्यमान है . जिसके अंदर दूसरों के सुख-दुःख को समझने एवं अनुभव करने की क्षमता होती है . यह विवेक ही है , जो उचित-अनुचित के बीच भेद कर सके और हमारे विरोध के उपरांत साहस के साथ उचित को अपना सके . इस संस्कृति का मुख्य उद्देश्य मनुष्य का निर्माण करना और नव- निर्मित मानव को सतत विकसित कर ऋषियों के समान बना देना है , जो सांस्कृतिक तत्त्वों को अपनी प्रबल प्रेरणा - तपस्या से पोषित करता है . तात्पर्य यह है  कि संस्कृति एक नया मानव गढ़ती है और उसे रिशित्व प्रदान करती है . इस प्रकार ऋषि संस्कृति को अपने प्राणों से सींच कर अक्षुण बनाये रखता है . इसमें मानव के विकास के साथ समाज एवं राष्ट्र के विकास की समस्त संभावनाएं सन्निहित होती हैं .

संस्कृति व्यक्ति , समाज , राष्ट्र और विश्व के सतत विकास का महत्त्व पूर्ण आधार है . सांस्कृतिक मूल्य इनके बीच के सम्बन्धों की सदा समीक्षा करते हैं , ताकि मनुष्य जिसे समाज एवं राष्ट्र के विकास की इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गयी है , उसका वह समुचित निर्वहण कर सके तथा समाज व राष्ट्र उसकी यथोचित व्यवस्था कर सके . सभी एक दूसरे के साथ बेहतर ताल - मेल बनाये रख सकें तथा आपसी सम्बन्धों में कहीं कोई व्यतिक्रम न आ सके . केवल इतना ही नहीं कि व्यक्ति राष्ट्र और समाज के साथ सम्बन्ध बनाये रख सके ; अपितु वह प्रकृति के सभी घटकों के साथ सौहार्दपूर्ण व्यवहार कर सके .

संस्कृति का एक और तत्त्व आध्यात्मिक मूल्य तो इस सबका मूल है .  जो यह बताता है कि परोक्ष एवं प्रत्यक्ष सबी रूपों में जुड़ने और इनको ऊर्जान्वित करने वाले उस परम तत्त्व परमात्मा से कैसे ताल - मेल स्थापित करें ; क्योंकि परमात्मा ही हम सबका मूल है और वह हमारे अस्तित्व का केंद्र है . यह हम सभी के अंतरतम केंद्र में स्थित है . इसके बिना तो सृष्टि की ही कल्पना सम्भव नहीं है और साथ में प्रकृति का भी अस्तित्व भी सम्भव नहीं है .

भारतीय संस्कृति जीवन के सभी आयामों एवं सभी अंगों समान ढ़ंग से विकसित एवं पोषित करने की बहुत अच्छी व्यवस्था देती है और इस व्यवस्था को क्रियान्वित करने की महत्त्वपूर्ण स्थिति मानव के हाथों में ही होती है .ऐसा मानव जिसके अंदर विवेक हो , संवेदनशीलता  हो . तथा वह जीवनमूल्यों को स्वयं में एवं समाज में क्रियान्वित करने का अपार साहस एवं समझ हो . परन्तु विडम्बना ही कहें कि कि सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षक ही क्षुद्र एवं नहित स्वार्थपरता एवं अहंकार के कारण अपने सबसे बड़े शत्रु बन गये हैं . जिनके सशक्त कंधों पर यह भार सौंपा गया था , वह आज इतना कमजोर एवं दुर्बल हो गया है कि उससे यह भार सम्भाला ही नहीं जाता है और यही कारण है कि भारतीय संस्कृति की रगों में अपसंस्कृति का विष तेजी से फैलने लगा है तथा मूल्यपरक हमारी संस्कृति अचेत एवं मूर्च्छा की अवस्था में आकुल-व्याकुल पड़ी है .

सांस्कृतिक मूल्य छिन्न - भिन्न पड़े हैं तथा अपसंस्कृति इसका भरपूर लाभ उठा रही है . इसके कारणों में एक है _ हमारे देश में नव उदारवादी भूमंडलीकरण का उदय होना . इसे हो सकता है कि देश को कई रूपों में अनेक लाभ हों ; परन्तु इससे जो क्षति हुयी है , वह है हमारी संस्कृति को उद्योग एवं व्यवसायिक बन देना . संस्कृति में मानव - जीवन को गढ़ने हेतु मूल्य निर्धारित होते हैं  , परन्तु उद्योग या व्यवसाय में वस्तु के लाभ एवं हानि पर अधिक बल दिया जाता है . इस उदारवादी भूमंडलीकरण चीजों को खुली छूट मिल गयी है , जिससे जीवन- मूल्य नष्ट- प्राय: हो गये . परिणामत: इलेक्ट्रोनिक मीडिया , प्रिंट मीडिया , विदेशी पूंजी का निवेश तथा निजी पूंजी का खुलकर प्रयोग होने लगा है . इस सन्दर्भ में आस्ट्रेलियाई अर्थशास्त्री मैनफ्रेड बी स्टिंगर ने अपनी पुस्तक ' ग्लोबलाइजेशन _ ए वेरी शार्ट इंट्रोडकशन ' में उल्लेख किया है कि निजी पूंजी का एकमात्र उद्देश्य अधिकतम लाभ उपार्जित करना है . इसके लिए वह अपने उत्पादों की लागत घटाने तथा मांग बढ़ाने का अथक प्रयास करता है . मीडिया अपने प्रसारित कार्यक्रमों तथा सामग्रियों की मांग बढ़ाने के लिए दर्शकों श्रोताओं और पाठकों के मन में ऐसी बात डाल देता है कि , जिसका प्रभाव बड़ा गहरा होता है .

इस सन्दर्भ में अमेरिका के समाजविज्ञानी बेंजामिन बार - बार कहते हैं कि संस्कृति में एक मूल्य होता है कि कहाँ , कब और किसे , किस रूप में प्रस्तुत करना है . इससे देश , काल और परिस्थिति के अनुरूप व्यवहार करने की बात कही जाती है . आज मनोरंजन के नाम पर जिस अश्लीलता का पाठ पढ़ाया जाता है , उसका प्रभाव वर्तमान समाज में स्पष्ट दिखाई दे रहा है . आज के नीति निर्धारक सुनियोजित षड्यंत्रों के अनुसार अपनी बात मनवा लेने का मनोवैज्ञानिक हथकंडा अपनाते हैं . वे डराकर और लोभ पैदा कर अपने प्रस्तुतीकरण करने में सफल हैं . उनका उद्देश्य है _ तात्कालिक लाभ कमाना , चाहे इसके लिए किसी को , किसी रूप में , कितनी भी हानि उठानी पड़े , कोई अंतर नहीं पड़ता है . अत: आज की अपसंस्कृति का उद्देश्य है _ ' भोग भोगो , अर्थोपार्जन करो , चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े .

भारतीय संस्कृति कहती है _ ' तेन त्यक्तेन भुंजीथा: ' अर्थात त्याग के साथ भोग होना चाहिए . अधुना तो त्याग की बात ही नहीं है , केवल भोग ही भोग है और इस भोग ने मनुष्य को एकदम खोखला बना दिया है और जीवनमूल्य छीन लिए गये हैं , परन्तु जहाँ त्याग होगा और एक दूसरे के प्रति सहयोग एवं सहकार की भावना होगी ; संवेदनशीलता अर्थात दूसरों के सुख-दुःख को अनुभव करने की क्षमता होगी , वहीँ मानव-संस्कृति का विकास होगा . इसी से मानवीय मूल्यों की स्थापना होगी . अत: मानवीय गुणों का विकास होगा तथा भविष्य में नए मानव के जन्म का पथ प्रशस्त होगा . सम्प्रति इसी प्रकार की संस्कृति की ही आवश्यकता है .*******************

यज्ञ का सकारात्मक प्रभाव

यज्ञ का सकारात्मक प्रभाव 


सूक्ष्मविज्ञान पर आधारित यज्ञ की प्रभावोत्पादकता हविर्द्रव्यों , समिधाओं , मंत्रोच्चार , प्रयोक्ता के व्यक्तित्व  एवं समय - विशेष पर आधारित होती है . इन सभी का समुचित संतुलन बन जाने पर यज्ञ में एक विशिष्ट प्रकार का चुम्बकीय प्रभाव एवं प्रवाह उत्पन्न होता है . यह यजनकर्त्ता के साथ-साथ सम्पूर्ण वातावरण पर सकारात्मक प्रभाव प्रस्तुत करता है .

प्राय: यज्ञ करने पर यज्ञीय धूम्र नीचे से ऊपर की ओर चलता है . यदि वायु स्थिर हो , हवा न चल रही हो तो इस धूएँ का बहाव सीधा एवं नियंत्रित होता है . वायु मिश्रित धूएँ में विद्युत् आविष्ट कणों तथा आयनों का एक कोलाईडल घोल होने के कारण इसके सीधे ऊपर की ओर चलने के वही प्रभाव होंगे ; जो की एक विद्युत् - प्रवाह के होते हैं . जिस तरह से किसी भी विद्युतीय - प्रवाह से चुम्बकीय क्षेत्र बनता है , उसी तरह से यज्ञकुंड से उठने वाले धूएँ के चारों ओर एक चुम्बकीय क्षेत्र बनता है और यह यजनकर्त्ता को सीधे प्रभावित करता है .

यज्ञ - विज्ञान की प्रमाणिकता को सिद्ध करने के लिए यह आवश्यक है की हवन-कुंड से उठने वाली यज्ञ - शिखा का विस्तृत भौतिक विश्लेषण किया जाये . इससे स्पष्ट हो जायेगा कि यज्ञ-कुंड से काफी मात्रा में विद्युत् चुम्बकीय तरंगे उठती हैं और ये माइक्रोवेव या अल्ट्राशोर्टवेव स्तर की होती हैं . इन तरंगों की प्रगाढ़ता यज्ञ-कुंड के आस-पास के वातावरण को ठंडा करने  से और बढ़ जाती हैं . हवन कुंड के चारों ओर एक नाली बनाकर उसमें जल भरने से तथा यज्ञ शाला के निकट अनेक जल भरे कलश स्थापित करने को इसी उद्देश्य की पूर्ति के रूप में समझा जा सकता है .

सस्वर मंत्रोच्चार से उत्पन्न ध्वनि - कम्पनों से यज्ञ-शिखा पर ऐसा प्रभाव पड़ता है कि जिसके कारण उससे निकलने वाली विद्युत् चुम्बकीय तरंगे प्रभावित होती हैं . इस तरह से रेडियो - प्रसारण जैसा एक तन्त्र भौतिकी के आधार पर कार्य करता हुवा देखा जा सकता है . हवन-कुंड विशेष धातुओं , जैसे चांदी या ताम्बे का बनाकर इन विद्युत् तरंगों की आवृत्ति तथा आवेग को नियंत्रित किया जा सकता है . साथ ही मंत्रोच्चार से स्वयं यजन कर्त्ता को विद्युत् चुम्बकीय तरंगों का केंद्र बनते हुवे स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है . मंत्रोच्चार करने वाले व्यक्ति की सम्पूर्ण काया शरीर में उठने वाली यांत्रिक कम्पनों से झंकृत होने लगती है . शरीर का पत्येक कोश-सेल एक इलेक्ट्रिक कैपेसिटर _ विद्युत् संधारित है . सुप्रसिद्ध विज्ञानवेत्ता बेस्ट एंड टेलर के अनुसार इसकी विद्युत् संधारित क्षमता _ इलेक्ट्रिक कैपेसिटेंस लगभग एक माइक्रोफेड प्रतिवर्ग सेंटीमीटर आंकी गयी है .

सामान्यत: रेडियो तथा टेलीविजन आदि यंत्रों में लगने वाले विद्युत् संधारित्रों की क्षमता शरीर को कोशकीय क्षमताओं से कहीं कम होती है . किसी भी मानक से इस क्षमता को बहुत विस्मयकारी कहा जा सकता है . प्राय: व्यक्ति यह नहीं जानता कि उसके शरीर में इतनी भरी विद्युत्शक्ति को धारण करने की क्षमता है . 


जब शरीर का प्रत्येक अवयव _ कोश एवं ऊतक ध्वनि - कम्पनों से झंकृत होने लगता है ; तो भौतिकों के शब्दों में ये कम्पन एक विद्युत् संधारित्र के कम्पन मने जा सकते हैं तथा इन कम्पनों से विद्युत् चुम्बकीय तरंगों का बनना अवश्यम्भावी है . यही वैद्युतीय चुम्बकीय तरंगें हवनकुंड के आस-पास बैठे हुवे यज्ञ - कर्त्ताओं को सीधे भी प्रभावित करेंगी तथा परावर्तित होकर भी . इन तरंगों का परावर्तन इसलिए होना सम्भव है , क्योंकि यज्ञीय अग्नि - शिखा विद्युत् आवेशधारी आयनों तथा कणों का एक समूह है . इस समूह से विद्युत् चुम्बकीय तरंगें परावर्तित होकर मंत्रोच्चार करने वाले व्यक्ति तथा अन्य यजनकर्ताओं पर पड़ना वैसे ही समझा जा सकता है ; जैसे शार्टवेव रेडियो ट्रांसमीटर से चलने वाली विद्युत् चुम्बकीय तरंगें पृथ्वी के वायुमंडल आयस्नोफीयर परत से टकराकर वापिस आती हैं और पृथ्वी की गोल स्थ पर दूर - दूर तक फ़ैल जाती है . इस प्रक्रिया में अग्निशिखा को एक प्रबल एम्प्लीफायर या प्रवर्तक के रूप में माना जा सकता है , जिसमें विद्युत् का स्रोत विद्युत् लाइन या सेल नहीं , वरन यज्ञीय ऊर्जा _ अग्निशिखा है .

यज्ञ का प्रभाव मनुष्य के शरीर पर नहीं ; मन और अन्तश्चेतना पर भी पड़ता है .  इसका स्थूल रूप यज्ञोपैथी के रूप में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है . यज्ञोपैथी में स्थूल चुम्बकों का प्रयोग तो नहीं होता ; पर यज्ञ - प्रक्रिया के फलस्वरूप चुम्बकीय क्षेत्र और प्रबल विद्युत् तरंगें अवश्य बनती हैं . यज्ञीय धूम्र में ऋण आवेशग्रस्त कणों का होना रसायनशास्त्र के आधार पर स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है . ये कण नीचे से ऊपर की ओर चलते हैं ओर भौतिकी के प्रचलित नियमों के अनुसर धुंए की इस प्रवाह - प्रक्रिया को ऊपर से नीचे की ओर चलने वाले एक विद्युत् करेंट के समतुल्य समझा जा सकता है . यह करेंट जो विद्युत् - क्षेत्र बनाएगा , उसका उत्तरी ध्रुव यज्ञ - कुंड के उत्तर की ओर तथा दक्षिणी ध्रुव यज्ञकुंड के दक्षिण की ओर होगा . यज्ञ से उत्पन्न होने वाला यह चुम्बकीय क्षेत्र पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की काट नहीं करेगा , वरन दोनों जुड़कर एक सशक्त चुम्बक जैसा प्रभाव डालेंगे .


क्योंकि यज्ञ - धूम्र यज्ञशाला के समूचे वातावरण में फ़ैल जाता है , इसलिए यह चुम्बकीय क्षेत्र यजन कर्त्ता को समान रूप से प्रभावित करता है . प्रचलित चुम्बक चिकित्सा में प्रयोग किए जाने वाले बड़े-बड़े चुम्बक , जो मात्र शरीर के कुछ ही स्थानों या भागों पर प्रभाव डालते हैं ; इसकी अपेक्षा यज्ञ-धूम्र के छोटे-छोटे चुम्बकीय प्रभावधारी कण सूक्ष्म होने के कारण कहीं अधिक लाभकारी होते हैं . यज्ञ चिकित्सा की प्रभावोत्पादकता का एक यह भी रहस्य है .

वास्तव में हमारी पुरातन वैदिक यज्ञ - पद्धति पूर्णतया विज्ञान- सम्मत है . पूर्व समय में हर घर परिवार में नित्य यज्ञ होता था और सभी निरोग रहते थे . यज्ञ के माध्यम से सभी संस्कार होते थे और इसी से निखर कर मनुष्य दैविक गुणों को धारण करता था . यज्ञ से साधना , संस्कार , तप आदि का श्रीगणेश होता है . यज्ञ मात्र संस्कार ही नहीं , अपितु साधना की सतत प्रक्रिया है .&&&&&&&&&&




है अँधेरी रात तो दीपक जलाना कब मना

है अँधेरी  रात तो दीपक जलाना कब मना 




` तमसो मा ज्योतिर्गमय ` अर्थात अंधकार की ओर नहीं , अपितु ज्योति अर्थात प्रकाश की ओर चलो . प्रकाश की ओर बढ़ना प्रगति की ओर बढ़ना है . एक दीप हो अंधकार का नाश कर देता है , जबकि अनेक दीपक प्रकाशोत्सव बना देते हैं . प्रकाश का जीवन में बहुत ही महत्त्व है . प्रकाश अपने आप में एक सृजन का प्रतीक है . प्रकाश जीवन को उल्लासमय बना देता है . प्रकाश उत्साह एवं जीवन का लक्ष्य निर्धारित करता है . लेकिन जीवन की ज्योति तो आत्मा से प्रकाशित होती है . प्रत्येक व्यक्ति एक दीप के समान है , जो आत्मतत्त्व की ऊर्जा से संसार को प्रकाश दे सकता है . समाज के उत्थान के लिए ज्ञान का प्रकाश चाहिए और स्वयं की प्रगति के लिए विवेक की शांति चाहिए . प्रेम की ज्योति घृणा एवं द्वेष के तिमिर को नष्ट करने में समर्थ है . ` आत्मदीपो भव ` के अनुसार स्वयं को एक दीपक के समान बनाना चाहिए और इसी दीप से प्रकाश प्राप्त हो सकता है और यह प्रकाश ही जीवन का सही लक्ष्य निर्धारित करता है .


जब हर्ष एवं उल्लास को व्यक्त करना हो या शांति व समृद्धि का संदेश देना हो तो दीपावली सजाई जाती है , लेकिन आत्मा बिलकुल परमात्मा है . वह अपने गुणों में दृश्यमान है . मानवता के गुण धर्म उन दीपों के समान हैं , जो कभी भी नहीं बुझते , पर हित के लिए सदैव जलते रहते हैं . परोपकार सभी गुणों का प्रेरक है , अर्थात इसी से सभी दीपों को प्रकाश मिलता है . निस्वार्थ भावना से ही त्याग का गुण प्रकट होता है . यही दीपावली की आध्यात्मिकता है .


जीवन में आत्मानुभूति से ही आध्यात्मिक यात्रा प्रारम्भ होती है . शुचिता का उदगम परमार्थ है . पवित्रता का स्रोत आत्मसमर्पण है . जीवन में सदैव प्रकाश रहता है और अंधकार कभी नहीं रहता . आनन्द की वर्षा होती है , कोई भी उपलब्द्धि असाध्य नहीं रहती है . प्रकाश के इस पावन पर्व पर जीवन का परम लक्ष्य प्राप्त होता है .*****