जीवन में लक्ष्य का बड़ा महत्त्व होता है . मनुष्य अपने जीवन में जिस लक्ष्य का निर्धारण कर लेता है तो उसी प्रकार उसकी जीवन-शैली बन जाती है . सबसे पहले व्यक्ति को मनुष्य बनना पड़ता है . पहले मनुष्य संसार के व्यवस्थापक प्रभु के दिव्य गुणों को मनुष्य समझे और फिर उन गुणों को समझकर अपने जीवन में धारण करे . तभी इस शरीर में मनुष्यता का जन्म होता है , केवल मानव - आकृति धारण करने से नहीं .
ज्ञान का लाभ तभी है जब वह आचरण का अंग बन जाये . क्योंकि जानना , मात्र जानने के लिए नहीं ; अपितु कुछ करने के लिए है . जो ज्ञान कर्म के साथ नहीं जुड़ता , वह निरर्थक है , वाहक के ऊपर लदे बोझ के समान है . जैसे गधे पर चन्दन लदा है तो वह उसके बोझ को तो अनुभव करता है , किन्तु चन्दन से काया लाभ है और उससे कैसे सुख प्राप्त किया जाता है ? वह इस बात को नहीं जानता .*****