धर्म कहता है _ गुण ग्रहण करो। यदि दोषों को गले लगाओगे तो सज्जन कैसे कहलाओगे ? वैज्ञानिकों के स्वर पहचानो , जो अन्वेषण में मस्त रहते हैं। वे बतलाते हैं कि दोषग्राही व्यक्ति प्राय: अस्वस्थ रहते हैं। आदमी के अंदर गुण और दोष दोनों रहते हैं , किन्तु धार्मिक जन गुण - ग्रहण में तल्लीन रहते हैं। वे धर्म के रहस्य पर माथा टेकते हैं। इसलिए संसारी - प्राणी की कमियां नहीं , खूबियाँ देखते हैं। कदाचित कोई त्रुटि दिख ही जाये , तो विचार करते हैं कि उस जैसे पद पर पहुंचने के बाद ; वह मुझ जैसा न हो पाए।vvvvvvvvvvvvvvvvvvvvvvvvvvvvvv
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